बच्चों की परवरिश में न करें ये गलतियाँ! 5 से 10 साल की उम्र में सिखाएँ ये 7 जरूरी बातें

जानिए 5 से 10 साल के बच्चों को भावनाएँ समझना, अनुशासन सीखना, आत्मनिर्भर बनना और सही निर्णय लेना कैसे सिखाएँ। माता-पिता के लिए अपनाएँ परवरिश के 7 प्रभावी तरीके।

 8
बच्चों की परवरिश में न करें ये गलतियाँ! 5 से 10 साल की उम्र में सिखाएँ ये 7 जरूरी बातें

बाल विकास

बच्चों का गुस्सा करना, छोटी-छोटी बातों पर जिद करना या पढ़ाई से बचना क्या माता-पिता के लिए चिंता का विषय है? यदि हाँ, तो बच्चे को बार-बार डाँटने के बजाय उसके व्यवहार के पीछे की वजह समझना जरूरी है। 5 से 10 वर्ष की उम्र में बच्चे भावनाओं को पहचानना, दूसरों के साथ व्यवहार करना और अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना सीखते हैं। ऐसे में माता-पिता का व्यवहार और मार्गदर्शन उनके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आइए जानते हैं परवरिश के ऐसे 7 आसान तरीके, जिनकी मदद से बच्चों में अनुशासन, आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और सकारात्मक व्यवहार विकसित करने में मदद मिल सकती है।

1. बच्चों की भावनाओं को समझें, केवल व्यवहार को नहीं

कई बार बच्चे गुस्सा करते हैं, रोते हैं या अपनी बात मनवाने के लिए जिद करते हैं। इसके पीछे निराशा, थकान, डर या अपनी बात व्यक्त न कर पाने जैसी वजहें हो सकती हैं।

ऐसी स्थिति में बच्चे को तुरंत डाँटने के बजाय उसकी बात सुनें और उसकी भावना को समझने की कोशिश करें।

क्या करें?

बच्चे से कहें, “मैं देख रहा हूँ कि तुम परेशान हो। क्या तुम मुझे बता सकते हो कि क्या हुआ?”

इस तरह की बातचीत से बच्चे को अपनी भावनाएँ पहचानने और उन्हें शब्दों में व्यक्त करने का अभ्यास मिलता है।

2. गुस्सा करने पर अपनाएँ शांत रहने का तरीका

बच्चों को गुस्सा आना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें यह सीखना जरूरी है कि गुस्से में भी दूसरों के साथ सुरक्षित और सम्मानजनक व्यवहार कैसे किया जाए।

यदि बच्चा किसी बात पर नाराज हो जाए, तो माता-पिता को अपनी आवाज शांत रखनी चाहिए। बच्चे को कुछ समय शांत होने दें और फिर समस्या पर बातचीत करें।

क्या न करें?

बच्चे को अपमानित करना, दूसरे बच्चों से उसकी तुलना करना या हर गलती पर चिल्लाना समस्या को सुलझाने के बजाय तनाव बढ़ा सकता है।

याद रखें: बच्चे को अपनी भावनाएँ व्यक्त करने की आजादी दें, लेकिन गलत व्यवहार के लिए स्पष्ट सीमाएँ भी तय करें।

3. घर में बनाएँ सरल और स्पष्ट नियम

बच्चों को अनुशासन सिखाने के लिए जरूरी है कि घर के नियम आसान, स्पष्ट और नियमित हों।

उदाहरण के लिए:

  • खेलने के बाद खिलौने अपनी जगह रखें।

  • दूसरों की चीजें लेने से पहले अनुमति माँगें।

  • अपनी बारी का इंतजार करें।

  • परिवार के सदस्यों और दोस्तों से सम्मानपूर्वक बात करें।

  • अपनी उम्र के अनुसार छोटे-छोटे काम स्वयं करने का प्रयास करें।

जब माता-पिता नियमों का पालन लगातार करवाते हैं और उनके पीछे का कारण समझाते हैं, तो बच्चे धीरे-धीरे जिम्मेदार व्यवहार सीखते हैं।

4. हर समस्या का समाधान खुद न करें

यदि बच्चा गृहकार्य में अटक जाए, कोई खिलौना न जोड़ पाए या किसी मित्र के साथ मतभेद हो जाए, तो तुरंत उसके लिए सब कुछ ठीक करने के बजाय उसे सोचने का अवसर दें।

उससे पूछें:

“तुम्हारे अनुसार इसे हल करने का दूसरा तरीका क्या हो सकता है?”

“तुमने अभी तक क्या-क्या प्रयास किए हैं?”

“क्या तुम्हें थोड़ी मदद चाहिए?”

इससे बच्चों को स्वतंत्र रूप से सोचने, विकल्प तलाशने और गलतियों से सीखने का अवसर मिलता है।

5. बच्चों में दया और दूसरों के प्रति सम्मान विकसित करें

अच्छी परवरिश का उद्देश्य केवल बच्चे को पढ़ाई में अच्छा बनाना नहीं, बल्कि उसे संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान बनाना भी है।

बच्चों को छोटी उम्र से ही साझा करना, दूसरों की बात सुनना, जरूरतमंद की मदद करना और अपनी गलती सुधारना सिखाएँ।

यदि बच्चा किसी दोस्त का खिलौना छीन ले, तो केवल उसे डाँटने के बजाय समझाएँ कि दूसरे बच्चे को कैसा महसूस हो सकता है।

उदाहरण के लिए, पूछें, “अगर कोई तुम्हारा खिलौना बिना पूछे ले ले, तो तुम्हें कैसा लगेगा?”

ऐसे सवाल बच्चों को दूसरों की भावनाओं के बारे में सोचने में मदद करते हैं।

6. छोटी जिम्मेदारियाँ देकर बनाएँ आत्मनिर्भर

बच्चों को हर काम में माता-पिता की मदद की जरूरत न पड़े, इसके लिए उन्हें उनकी उम्र के अनुसार जिम्मेदारियाँ देना जरूरी है।

5 से 6 वर्ष के बच्चे खिलौने समेटने और किताबें व्यवस्थित रखने का अभ्यास कर सकते हैं। 7 से 8 वर्ष के बच्चे स्कूल बैग तैयार करने में मदद कर सकते हैं। 9 से 10 वर्ष के बच्चों को अपनी दिनचर्या व्यवस्थित करने और छोटे निर्णय लेने के अधिक अवसर दिए जा सकते हैं।

बच्चे से कहें, “पहले तुम खुद कोशिश करो। जरूरत पड़ने पर मैं तुम्हारी मदद करूँगा।”

ध्यान रखें कि हर बच्चा अपनी गति से सीखता है। इसलिए उससे उसकी उम्र और क्षमता के अनुसार ही अपेक्षा रखें।

7. बच्चों की मेहनत की तारीफ करें, तुलना करने से बचें

क्या आप बच्चे से अक्सर कहते हैं, “देखो, तुम्हारा दोस्त कितना अच्छा पढ़ता है”? यदि हाँ, तो उसकी तुलना करने के बजाय उसके अपने प्रयासों पर ध्यान दें।

बच्चे की मेहनत, धैर्य, ईमानदारी और सुधार की सराहना करें।

उदाहरण के लिए, आप कह सकते हैं, “तुमने इस सवाल को हल करने के लिए लगातार कोशिश की। यह बहुत अच्छी बात है।”

ऐसी प्रतिक्रिया बच्चों को अपनी गलतियों से सीखने और कठिन कामों में प्रयास जारी रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।

उम्र के अनुसार बच्चों को कैसे सिखाएँ?

5 से 10 वर्ष की उम्र के सभी बच्चे एक जैसे नहीं होते। उनकी रुचियाँ, समझने की क्षमता और सीखने की गति अलग-अलग हो सकती है। फिर भी, उम्र के अनुसार कुछ सामान्य तरीके अपनाए जा सकते हैं।

5 से 6 वर्ष: खेल, कहानियों, चित्रों और छोटे निर्देशों की मदद से सिखाएँ।

7 से 8 वर्ष: जिम्मेदारियाँ दें, नियमों के पीछे के कारण समझाएँ और बच्चों को समस्या सुलझाने का अवसर दें।

9 से 10 वर्ष: निर्णय लेने में उनकी भागीदारी बढ़ाएँ, उनके विचार सुनें और उन्हें अपनी दिनचर्या व्यवस्थित करना सिखाएँ।

माता-पिता के लिए विशेष सलाह

बच्चों को अच्छी आदतें सिखाने के लिए केवल समझाना पर्याप्त नहीं है। माता-पिता को स्वयं भी वैसा व्यवहार अपनाना चाहिए, जिसकी वे बच्चों से अपेक्षा करते हैं।

यदि आप चाहते हैं कि बच्चा सम्मान से बात करे, तो उससे सम्मानपूर्वक बात करें। यदि आप चाहते हैं कि वह अपनी गलती स्वीकार करे, तो अपनी गलती होने पर स्वयं भी उसे स्वीकार करें।

बच्चों को बदलाव सीखने में समय लगता है। इसलिए धैर्य रखें, नियमों में निरंतरता बनाए रखें और छोटे-छोटे सुधारों की सराहना करें।

यदि बच्चे का व्यवहार लंबे समय तक गंभीर परेशानी पैदा कर रहा हो या उसकी पढ़ाई, दोस्ती और पारिवारिक जीवन प्रभावित हो रहे हों, तो योग्य बाल-स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।

निष्कर्ष: अच्छी परवरिश की शुरुआत घर से होती है

5 से 10 वर्ष की उम्र बच्चों को भावनाएँ समझने, अनुशासन सीखने, जिम्मेदार बनने और दूसरों का सम्मान करने की आदत डालने का महत्वपूर्ण समय है। प्यार, धैर्य, स्पष्ट नियम और सही मार्गदर्शन बच्चों के विकास में मदद कर सकते हैं।

याद रखें, बच्चे केवल हमारी बातें सुनकर नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार को देखकर भी सीखते हैं।

अगली विशेष रिपोर्ट में जानिए कि बच्चों में पढ़ाई की आदत, एकाग्रता और आत्मविश्वास कैसे विकसित किया जा सकता है।