18वीं सदी के महान संत-कवि संत गरीबदास जी: जानिए करौंथा (रोहतक) क्षेत्र व छुड़ानी से जुड़ा उनका पावन इतिहास और आध्यात्मिक योगदान
रोहतक जिले (वर्तमान झज्जर) के छुड़ानी गाँव में जन्मे संत गरीबदास जी का करौंथा और आसपास के रोहतक क्षेत्र से गहरा आध्यात्मिक व ऐतिहासिक संबंध रहा है।
हरियाणा की पावन धरा भक्ति और संतों की भूमि रही है। 18वीं सदी के महान दार्शनिक, अध्यात्म पुरुष और समाज सुधारक संत गरीबदास जी महाराज का नाम भारतीय संत परंपरा में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।
1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
संत गरीबदास जी का जन्म वैशाख पूर्णिमा, विक्रम संवत 1774 (25 अप्रैल, 1717) को धनखड़ गोत्र के जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम चौधरी बलराम जी और माता का नाम श्रीमती रानी देवी था।
2. रोहतक और करौंथा क्षेत्र का ऐतिहासिक संबंध
ऐतिहासिक और प्रशासनिक दृष्टि से, पूर्व में वर्तमान झज्जर जिला रोहतक जिले का ही हिस्सा था। संत गरीबदास जी का ननिहाल और जन्मस्थान छुड़ानी गाँव (वर्तमान झज्जर, तत्कालीन रोहतक जिला) रहा है। रोहतक जिले के करौंथा गाँव और आसपास के समूचे रोहतक-झज्जर क्षेत्र में संत गरीबदास जी के अनुयायी (गरीबदासी संप्रदाय) बड़ी संख्या में हैं। करौंथा गाँव में संत गरीबदास जी के विचारों और आध्यात्मिक ज्ञान से प्रेरित आश्रम और साधना केंद्र स्थापित हैं, जहाँ उनके अमर संदेशों का प्रचार-प्रसार किया जाता है।
3. आध्यात्मिक साक्षात्कार और कबीर साहिब का प्रभाव
परंपरागत वृत्तांतों के अनुसार, 10 वर्ष की अल्पायु में खेतों में गायें चराते समय संत गरीबदास जी का आध्यात्मिक साक्षात्कार हुआ। इस घटना के बाद उनमें दिव्य ज्ञान का स्फुरण हुआ और उन्होंने संत कबीर जी की वाणी व ईश्वर की सर्वव्यापकता को सरल लोकभाषा में प्रस्तुत करना शुरू किया।
4. अमर ग्रंथ (श्री सतगुरु ग्रंथ साहिब) की रचना
संत गरीबदास जी ने हज़ारों की संख्या में आध्यात्मिक पद, साखियाँ और रमैणियाँ रचीं। उनकी पवित्र वाणियों को 'श्री सतगुरु ग्रंथ साहिब' (जिसे अमर ग्रंथ साहिब भी कहा जाता है) के रूप में संकलित किया गया। उनकी रचनाओं में:
-
भक्ति और ईश्वर एकत्व पर बल दिया गया है।
-
जाति-पात, धार्मिक आडंबरों और ऊँच-नीच का कड़ा विरोध किया गया है।
-
मानवता, दया और नैतिक जीवन जीने का संदेश दिया गया है।
5. अमर विरासत
संत गरीबदास जी ने वर्ष 1778 में छुड़ानी में अपना शरीर त्यागा। उनकी याद में छुड़ानी गाँव में 'छतरी साहिब' यादगार बनी हुई है। आज भी रोहतक, झज्जर, कुरुक्षेत्र, पंजाब और उत्तर प्रदेश तक उनके लाखों श्रद्धालु उनकी वाणियों का पाठ करते हैं और उनके दिखाए सत्य के मार्ग पर चलते हैं।




