64 साल बाद ग्रीको-रोमन में भारत को मेडल:सोनीपत के नितेश ने एशियाड में सिल्वर जीता

एशियाई खेलों के ग्रीको-रोमन कुश्ती के फाइनल में जापान के यूरी नकाजातो से हार के बावजूद सोनीपत के जागसी गांव के नितेश सिवाच ने सिल्वर मेडल जीतकर भारत का 64 साल का पदक सूखा खत्म कर दिया। नितेश से पहले 1962 एशियाड में गणपत अंदलकर ने 97+ किग्रा भारवर्ग में भारत के लिए पदक जीता था।

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64 साल बाद ग्रीको-रोमन में भारत को मेडल:सोनीपत के नितेश ने एशियाड में सिल्वर जीता

एशियाई खेलों के ग्रीको-रोमन कुश्ती के फाइनल में जापान के यूरी नकाजातो से हार के बावजूद सोनीपत के जागसी गांव के नितेश सिवाच ने सिल्वर मेडल जीतकर भारत का 64 साल का पदक सूखा खत्म कर दिया। नितेश से पहले 1962 एशियाड में गणपत अंदलकर ने 97+ किग्रा भारवर्ग में भारत के लिए पदक जीता था। इसके बाद भारतीय ग्रीको-रोमन पहलवान इस प्रतियोगिता में पदक नहीं जीत सके थे। इस बार नितेश के पास जापानी पहलवान को हराकर गोल्ड जीतने का मौका था, लेकिन फाइनल में उन्हें रजत से संतोष करना पड़ा। नितेश से पहले भारत के सुमित (60 किग्रा) और अमन बरोनिया (77 किग्रा) क्वार्टर फाइनल में हारकर बाहर हो गए थे।

पिता का सपना, बेटे ने बनाया अपना जुनून नितेश सिवाच के पिता आनंद ने बताया कि नितेश उनका इकलौता बेटा है और उसकी एक बड़ी बहन है, जिसकी शादी हो चुकी है। आनंद खुद भी पहलवानी में रुचि रखते थे, लेकिन कुश्ती नहीं खेल सके। इसलिए उनका सपना था कि उनका बेटा पहलवान बने। बचपन में जब वह नितेश को गांव के अखाड़े में सुबह-शाम अभ्यास कराने ले जाते थे, तो धीरे-धीरे नितेश का भी कुश्ती के प्रति रुझान बढ़ गया। 6 साल की उम्र में अखाड़े में पहुंचा नितेश आनंद ने बताया कि 2008 में नितेश की स्कूल की पढ़ाई शुरू होने के बाद उन्होंने उसे पहली बार गांव के अखाड़े में ले जाना शुरू किया। उस समय नितेश करीब 6 साल का था।

इसके बाद करीब 4 साल तक पिता रोज सुबह-शाम उसे अखाड़े में लेकर जाते और अभ्यास कराने के बाद वापस घर लाते। वर्ष 2012 में खरखौदा के एक निजी स्कूल में पढ़ाई के साथ नितेश ने कुश्ती का अभ्यास जारी रखा। घुटने की चोट ने एक साल बिस्तर पर रखा साल 2014 में खरखौदा के प्रताप स्पोर्ट्स स्कूल में अभ्यास के दौरान नितेश के घुटने में गंभीर चोट लग गई। उसे ऑपरेशन कराना पड़ा और करीब एक साल तक वह बिस्तर पर रहा। इस दौरान शारीरिक परेशानी के साथ वह मानसिक रूप से भी परेशान रहने लगा। घर पर बैठे-बैठे परेशान नितेश को पिता ने अपने दूध के कारोबार में हाथ बंटाने के लिए कहा। एक साल दूध बेचा, फिर पिता से मांगी कुश्ती की अनुमति पिता आनंद ने बताया कि वह गांव से दूध खरीदकर पानीपत में दुकान और घर-घर जाकर बेचते थे।

 चोट से उबरने के दौरान नितेश ने करीब एक साल तक पिता के साथ दूध बेचने का काम किया। रोज सुबह उठना, दूध लेकर शहर जाना और घर-घर पहुंचाना उसकी दिनचर्या बन गई। कुछ समय बाद नितेश ने पिता से कहा कि वह दोबारा कुश्ती खेलना चाहता है। पिता ने उसे फिर से अखाड़े में जाने की अनुमति दे दी। 2017 में दोबारा शुरू किया अभ्यास नितेश ने वर्ष 2017 में खरखौदा की निजी कुश्ती अकादमी में दोबारा अभ्यास शुरू किया। इसके बाद उसने जिला, हरियाणा और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और कई पदक जीते।

एक बार एशियन गेम्स के ट्रायल में भी वह बाहर हो गया था, लेकिन उसने अभ्यास जारी रखा और लगातार प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता रहा। पहलवानी के खर्च के लिए शुरू किया दूध का कारोबार आनंद ने बताया कि परिवार के पास करीब 3 एकड़ जमीन थी और खेती से ही घर का गुजारा चलता था। नितेश की कुश्ती का खर्च बढ़ने लगा तो उन्होंने दूध बेचने का काम शुरू किया। उस समय पहलवानी पर करीब 15 हजार रुपए महीने तक खर्च हो जाते थे। करीब 12 साल पहले परिवार जागसी से पानीपत के सेक्टर-6 में आकर रहने लगा। इसके बाद गांव से दूध खरीदकर पानीपत में घर-घर पहुंचाने का कारोबार शुरू किया। पढ़ाई में कंपार्टमेंट, कुश्ती में लगातार कामयाबी नितेश ने कुश्ती के साथ पढ़ाई भी जारी रखी। वह 2025 में ग्रेजुएशन के अंतिम वर्ष में था, लेकिन उसे कंपार्टमेंट आ गई। दोबारा फॉर्म भरने के बाद 2026 में भी वह कंपार्टमेंट पास नहीं कर सका। पढ़ाई में भले ही उसे परेशानी का सामना करना पड़ा, लेकिन कुश्ती के मैदान में उसने लगातार अपना प्रदर्शन बेहतर किया और अब एशियाई खेलों में देश के लिए सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रच दिया।

2022 में रेलवे में मिली नौकरी वर्ष 2022 में नितेश को रेलवे पुलिस में टीसी के पद पर नौकरी मिली। इसके बाद वह नौकरी के साथ कुश्ती का अभ्यास करते रहे। यहीं से उन्होंने एशियाई खेलों की तैयारी पर फोकस किया और लंबे संघर्ष के बाद एशियाई खेलों के फाइनल तक पहुंचे। संयुक्त परिवार, चचेरे भाई भी करते हैं कुश्ती आनंद ने बताया कि उनका संयुक्त परिवार है। उनके छोटे भाई नवीन, उनकी पत्नी और दोनों बेटे भी साथ रहते हैं। नवीन के दोनों बेटे खरखौदा की कुश्ती अकादमी में अभ्यास करते हैं। परिवार में कुश्ती का माहौल होने से नितेश की मेहनत और सफर को लगातार परिवार का साथ मिला। आनंद ने कहा कि वह खुद पहलवानी करना चाहते थे, लेकिन मौका नहीं मिला। इसी वजह से उनका सपना था कि उनका बेटा पहलवान बने। चोट के बाद जब नितेश ने दोबारा कुश्ती खेलने की इच्छा जताई तो परिवार ने उसका साथ दिया। अब एशियाई खेलों में सिल्वर मेडल जीतकर नितेश ने परिवार के साथ देश और समाज का नाम रोशन किया है।

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