एशियन मेडल नहीं जीतने वाली पहलवान ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में जीता सिल्वर; 11 किमी साइकिल चलाकर जाती थीं ट्रेनिंग
यूपी के मथुरा जिले की 26 साल की महिला पहलवान नीलम सिरोही ने अस्ताना (कजाकिस्तान) में आयोजित वर्ल्ड रेसलिंग चैम्पियनशिप की 50 किग्रा स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रच दिया है।
हरियाणा के दबदबे वाले कुश्ती खेल में यूपी से निकली इतिहास रचने वाली महिला पहलवान नीलम सिरोही ने वह उपलब्धि हासिल की है, जिसकी तारीफ हर तरफ हो रही है। यूपी के मथुरा के पास पेंचरी गांव की नीलम सिरोही ने जब कुश्ती शुरू की, तब किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन वे दुनिया की बड़ी पहलवानों को चुनौती देंगी। न उनके पास हरियाणा के कुश्ती अखाड़ों जैसी मजबूत पृष्ठभूमि थी, न अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े खिताब जीतने का अनुभव। लेकिन 26 साल की नीलम ने अपने हौसले से वह मुकाम हासिल कर लिया, जहां पहुंचना भारतीय महिला पहलवानों के लिए सपना होता है।
कजाकिस्तान के अस्ताना में चल रही वर्ल्ड रेसलिंग चैम्पियनशिप में नीलम ने 50 किग्रा के फाइनल में हार का सामना किया और उन्हें सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा।
मामा ने सिखाए कुश्ती के शुरुआती गुर
नीलम की कामयाबी की कहानी किसी बड़े खेल केंद्र से नहीं, बल्कि एक ऐसे इलाके से शुरू हुई, जहां कुश्ती की परंपरा लगभग खत्म हो चुकी थी। मथुरा के कैप्टन मुख्तियार सिंह ने 1966 व 1970 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीते थे, लेकिन उनके बाद इलाके में मिट्टी के अखाड़ों तक कुश्ती सीमित रह गई। नीलम के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था। नीलम के मामा जनार्दन सिंह ने उन्हें कुश्ती के शुरुआती गुर सिखाए। वे खुद राष्ट्रीय स्तर पर खिताब जीत चुके थे। उन्होंने नीलम और उनके भाइयों को अभ्यास कराना शुरू किया।
हालांकि, गांव के कुछ लोग पिता से सवाल करते कि बेटी को कुश्ती क्यों करवा रहे हैं। लेकिन नीलम का लक्ष्य साफ था। उसकी प्रतिभा देखकर जनार्दन ने पिता को दिल्ली ले जाकर ट्रेनिंग दिलाने की सलाह दी।
साइकिल से 11 किमी दूर जाती थीं ट्रेनिंग के लिए
पिता नीलम को पहले दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम ले गए, लेकिन वहां केवल लड़कों को ट्रेनिंग मिलती थी। इसके बाद उन्हें द्वारका की एक ऐसी अकेडमी मिली, जहां लड़कियां भी अभ्यास करती थीं। वहां उनका घर अकेडमी से करीब 11 किमी दूर था। 12 साल की नीलम ने खुद साइकिल से अकेडमी जाने की जिद की। पिता बताते हैं कि उन्होंने बेटी को एक बार रास्ता दिखाया, इसके बाद वह अकेले साइकिल से ट्रेनिंग करने जाने लगी।
नीलम ने राज्य और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेलते हुए भारतीय टीम में जगह बनाई। इससे उन लोगों की सोच भी बदली, जो कभी उनके कुश्ती खेलने के खिलाफ थे।
कड़े संघर्ष के बाद मिला सफलता का मुकाम
सीनियर स्तर पर नीलम को आसानी से सफलता नहीं मिली। 50 किग्रा वर्ग में कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण उन्हें कई मौके गंवाने पड़े। वे दो सीनियर वर्ल्ड चैम्पियनशिप में पहले दौर में ही बाहर हो गई थीं। एशियन चैम्पियनशिप में मेडल नहीं मिला और एशियन गेम्स में भी खेलने का मौका नहीं आया। इसके बावजूद उन्होंने अभ्यास जारी रखा।
इसका नतीजा वर्ल्ड चैम्पियनशिप में मेडल के रूप में मिला। कोच वीरेंद्र सिंह के मुताबिक, नीलम सही समय पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन तक पहुंची हैं। ओलंपिक के लिहाज से भी यह अनुभव अहम साबित हो सकता है।




