आजादी के बाद से एक ही छत के नीचे विराजित श्री राधा-कृष्ण और श्री गुरु ग्रंथ साहिब का दरबार

देवेंद्र शुक्ला\ बेरी के मेन बाजार का एक धार्मिक स्थल हिंदू-सिख परंपरा का गवाह आजादी के बाद से बना हुआ है। यहां एक ही छत के नीचे श्री राम दरबार और राधा कृष्ण की मूर्तियां हैं तो हॉल के बीचों बीच श्री गुरु ग्रंथ साहिब का दरबार भी पूरी तरह सजा हुआ है।

आजादी के बाद से एक ही छत के नीचे विराजित श्री राधा-कृष्ण और श्री गुरु ग्रंथ साहिब का दरबार
Since independence, the court of Shri Radha-Krishna and Shri Guru Granth Sahib, under the same roof

देवेंद्र शुक्ला\झज्जर. बेरी के मेन बाजार का एक धार्मिक स्थल हिंदू-सिख परंपरा का गवाह आजादी के बाद से बना हुआ है। यहां एक ही छत के नीचे श्री राम दरबार और राधा कृष्ण की मूर्तियां हैं तो हॉल के बीचों बीच श्री गुरु ग्रंथ साहिब का दरबार भी पूरी तरह सजा हुआ है। यहां आने वाले श्रद्धालु राम-कृष्ण समेत अन्य देवी देवताओं की आरती के बाद श्री गुरु ग्रंथ साहिब के शब्द गान के बाद अरदास करते हैं।

 

इस धार्मिक स्थल का नाम भी राधा कृष्ण मंदिर गुरुद्वारा रखा गया है। यहां पूरी शिद्दत के साथ श्री कृष्ण का जन्म दिवस धूमधाम से मनाया जाता है तो सिख धर्म के सभी अनुयायियों और श्री गुरु नानक देव का प्रकाश पर्व की भी धूम रहती है। श्री नवदुर्गा मंदिर बूढ़ा महादेव मंदिर के पुजारी अनिल भारद्वाज ने बताया कि मान्यतानुसार भगवान श्रीहरि ने कार्तिक पूर्णिमा पर ही मत्स्य अवतार लेकर सृष्टि की फिर से रचना की थी और भगवान श्री कृष्ण ने इसी तिथि पर रास रचाया था। वहीं सिख धर्म के संस्थापक सिखों के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव का जन्म इसी तिथि को हुआ था। इस पवित्र तिथि काे देखते हुए भी बेरी के इस राधा कृष्ण मंदिर में हिंदू व सिख धर्म की अराधना की परंपरा चली अा रही है।


श्रद्धालु देवी देवताओं की पूजा कर आरती करते हैं, उसके बाद गुरुवाणी की शब्दों का वाचन करते हैं
इस धार्मिक स्थल के प्रति समाज के लोगों की धार्मिक प्रवृत्ति का आलम यह है कि पहले यहां श्रद्धालु देवी देवताओं की पूजा कर आरती करते हैं उसके बाद गुरुवाणी की शब्दों का वाचन किया जाता है। यहां सिख धर्म की परंपरा निभाने वाले और देवी देवताओं की पूजा करने वाली संगत एक ही है। मंगलवार को गुरु पर्व के मौके पर भी कई श्रद्धालुओं की तरह मंदिर स्थल की देखरेख करने वालों में से एक सतीश ने पहले राधा कृष्ण की आरती उतारी अाैर इसके बाद श्री गुरु ग्रंथ साहिब की सेवा में जुट गए।

साथ ही संगत ने भी उनका अनुसरण किया। सतीश ने बताया कि देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से आई पंजाबी बिरादरी ने यहां बेरी के मेन बाजार में एक ही छत के नीचे सिख और हिंदू धर्म के स्थल को इसीलिए चुना क्योंकि पाकिस्तान से ही यह परंपरा चली आ रही थी। पुरखों ने जो रवायत बेरी में डाली उसका सिलसिला आज भी यूं ही जारी है। इसके अलावा सतीश ने यह भी कहा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में कई बार भगवान श्रीराम के नाम का उल्लेख किया है लिहाजा बेरी का ये स्थान िहंदू-सिख परंपरा काे निभा रहा है।